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महाभारत 5.47.39
ह्रीमान्मनीषी बलवान्मनस्वी; स लक्ष्मीवान्सोमकानां प्रबर्हःन जातु तं शत्रवोऽन्ये सहेर;न्येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः
hrīmānmanīṣī balavānmanasvī; sa lakṣmīvānsomakānāṃ prabarhaḥna jātu taṃ śatravo'nye sahera;nyeṣāṃ sa syādagraṇīrvṛṣṇisiṃhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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