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महाभारत 5.47.47
यदा मौर्व्यास्तलनिष्पेषमुग्रं; महाशब्दं वज्रनिष्पेषतुल्यम्विधूयमानस्य महारणे मया; गाण्डीवस्य श्रोष्यति मन्दबुद्धिः
yadā maurvyāstalaniṣpeṣamugraṃ; mahāśabdaṃ vajraniṣpeṣatulyamvidhūyamānasya mahāraṇe mayā; gāṇḍīvasya śroṣyati mandabuddhiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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