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महाभारत 5.47.56
कांदिग्भूतं छिन्नगात्रं विसंज्ञं; दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम्हताश्ववीराग्र्यनरेन्द्रनागं; पिपासितं श्रान्तपत्रं भयार्तम्
kāṃdigbhūtaṃ chinnagātraṃ visaṃjñaṃ; duryodhano drakṣyati sarvasainyamhatāśvavīrāgryanarendranāgaṃ; pipāsitaṃ śrāntapatraṃ bhayārtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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