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महाभारत 5.47.84
नमस्कृत्वा शांतनवाय राज्ञे; द्रोणायाथो सहपुत्राय चैवशारद्वतायाप्रतिद्वन्द्विने च; योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः
namaskṛtvā śāṃtanavāya rājñe; droṇāyātho sahaputrāya caivaśāradvatāyāpratidvandvine ca; yotsyāmyahaṃ rājyamabhīpsamānaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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