महाभारत 5.49.3
के स्विदेनं वारयन्ति शाम्य युध्येति वा पुनःनिकृत्या कोपितं मन्दैर्धर्मज्ञं धर्मचारिणम्
ke svidenaṃ vārayanti śāmya yudhyeti vā punaḥnikṛtyā kopitaṃ mandairdharmajñaṃ dharmacāriṇam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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