महाभारत 5.50.39
भीष्मप्रतापात्कुरवो नयेनान्धकवृष्णयःते न तस्य वशं जग्मुः केवलं दैवमेव वा
bhīṣmapratāpātkuravo nayenāndhakavṛṣṇayaḥte na tasya vaśaṃ jagmuḥ kevalaṃ daivameva vā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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