महाभारत 5.52.3
यश्च सेन्द्रानिमाँल्लोकानिच्छन्कुर्याद्वशे बलीस श्रेष्ठो जगतः कृष्णः पाण्डवानां जये धृतः
yaśca sendrānimām̐llokānicchankuryādvaśe balīsa śreṣṭho jagataḥ kṛṣṇaḥ pāṇḍavānāṃ jaye dhṛtaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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