महाभारत 5.52.4
समस्तामर्जुनाद्विद्यां सात्यकिः क्षिप्रमाप्तवान्शैनेयः समरे स्थाता बीजवत्प्रवपञ्शरान्
samastāmarjunādvidyāṃ sātyakiḥ kṣipramāptavānśaineyaḥ samare sthātā bījavatpravapañśarān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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