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महाभारत 5.53.4
पिता श्रेष्ठः सुहृद्यश्च सम्यक्प्रणिहितात्मवान्आस्थेयं हि हितं तेन न द्रोग्धा गुरुरुच्यते
pitā śreṣṭhaḥ suhṛdyaśca samyakpraṇihitātmavānāstheyaṃ hi hitaṃ tena na drogdhā gururucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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