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महाभारत 5.54.17
ततो द्रोणोऽब्रवीद्भीष्मः कृपो द्रौणिश्च भारतमत्वा मां महतीं चिन्तामास्थितं व्यथितेन्द्रियम्
tato droṇo'bravīdbhīṣmaḥ kṛpo drauṇiśca bhāratamatvā māṃ mahatīṃ cintāmāsthitaṃ vyathitendriyam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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