महाभारत 5.54.25
अप्यग्निं प्रविशेयुस्ते समुद्रं वा परंतपमदर्थे पार्थिवाः सर्वे तद्विद्धि कुरुसत्तम
apyagniṃ praviśeyuste samudraṃ vā paraṃtapamadarthe pārthivāḥ sarve tadviddhi kurusattama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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