महाभारत 5.54.45
शरव्रातैस्तु भीष्मेण शतशोऽथ सहस्रशःद्रोणद्रौणिकृपैश्चैव गन्ता पार्थो यमक्षयम्
śaravrātaistu bhīṣmeṇa śataśo'tha sahasraśaḥdroṇadrauṇikṛpaiścaiva gantā pārtho yamakṣayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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