महाभारत 5.54.55
संशप्तानि च वृन्दानि क्षत्रियाणां परंतपअर्जुनं वयमस्मान्वा धनंजय इति स्म ह
saṃśaptāni ca vṛndāni kṣatriyāṇāṃ paraṃtapaarjunaṃ vayamasmānvā dhanaṃjaya iti sma ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें