महाभारत 5.54.60
प्राग्ज्योतिषाधिपः शल्य आवन्त्योऽथ जयद्रथःदुःशासनो दुर्मुखश्च दुःसहश्च विशां पते
prāgjyotiṣādhipaḥ śalya āvantyo'tha jayadrathaḥduḥśāsano durmukhaśca duḥsahaśca viśāṃ pate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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