महाभारत 5.56.8
जारासंधिर्मागधश्च धृष्टकेतुश्च चेदिराट्पृथक्पृथगनुप्राप्तौ पृथगक्षौहिणीवृतौ
jārāsaṃdhirmāgadhaśca dhṛṣṭaketuśca cedirāṭpṛthakpṛthaganuprāptau pṛthagakṣauhiṇīvṛtau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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