महाभारत 5.57.17
त्यक्तं मे जीवितं राजन्धनं राज्यं च पार्थिवन जातु पाण्डवैः सार्धं वसेयमहमच्युत
tyaktaṃ me jīvitaṃ rājandhanaṃ rājyaṃ ca pārthivana jātu pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ vaseyamahamacyuta
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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