महाभारत 5.57.5
अङ्गेमां समवेक्षस्व पुत्र स्वामेव वाहिनीम्जात एव तव स्रावस्त्वं तु मोहान्न बुध्यसे
aṅgemāṃ samavekṣasva putra svāmeva vāhinīmjāta eva tava srāvastvaṃ tu mohānna budhyase
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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