महाभारत 5.60.5
नैव मानुषवद्देवाः प्रवर्तन्ते कदाचनकामाल्लोभादनुक्रोशाद्द्वेषाच्च भरतर्षभ
naiva mānuṣavaddevāḥ pravartante kadācanakāmāllobhādanukrośāddveṣācca bharatarṣabha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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