महाभारत 5.66.11
स कृत्वा पाण्डवान्सत्रं लोकं संमोहयन्निवअधर्मनिरतान्मूढान्दग्धुमिच्छति ते सुतान्
sa kṛtvā pāṇḍavānsatraṃ lokaṃ saṃmohayannivaadharmaniratānmūḍhāndagdhumicchati te sutān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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