महाभारत 5.66.2
द्यामन्तरं समास्थाय यथायुक्तं मनस्विनःचक्रं तद्वासुदेवस्य मायया वर्तते विभो
dyāmantaraṃ samāsthāya yathāyuktaṃ manasvinaḥcakraṃ tadvāsudevasya māyayā vartate vibho
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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