महाभारत 5.66.5
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव पुरुषोत्तमःमनसैव विशिष्टात्मा नयत्यात्मवशं वशी
pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca dyāṃ caiva puruṣottamaḥmanasaiva viśiṣṭātmā nayatyātmavaśaṃ vaśī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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