महाभारत 5.67.12
जानात्येष हृषीकेशं पुराणं यच्च वै नवम्शुश्रूषमाणमेकाग्रं मोक्ष्यते महतो भयात्
jānātyeṣa hṛṣīkeśaṃ purāṇaṃ yacca vai navamśuśrūṣamāṇamekāgraṃ mokṣyate mahato bhayāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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