महाभारत 5.68.6
पुण्डरीकं परं धाम नित्यमक्षयमक्षरम्तद्भावात्पुण्डरीकाक्षो दस्युत्रासाज्जनार्दनः
puṇḍarīkaṃ paraṃ dhāma nityamakṣayamakṣaramtadbhāvātpuṇḍarīkākṣo dasyutrāsājjanārdanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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