महाभारत 5.7.4तमेव दिवसं चापि कौन्तेयः पाण्डुनन्दनःआनर्तनगरीं रम्यां जगामाशु धनंजयःtameva divasaṃ cāpi kaunteyaḥ pāṇḍunandanaḥānartanagarīṃ ramyāṃ jagāmāśu dhanaṃjayaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें