महाभारत 5.70.39
ह्रीमानवति देवांश्च पितॄनात्मानमेव चतेनामृतत्वं व्रजति सा काष्ठा पुण्यकर्मणाम्
hrīmānavati devāṃśca pitṝnātmānameva catenāmṛtatvaṃ vrajati sā kāṣṭhā puṇyakarmaṇām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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