Loading
महाभारत 5.70.4
यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिंदमतथा ते पाण्डवा रक्ष्याः पाह्यस्मान्महतो भयात्
yathā hi sarvāsvāpatsu pāsi vṛṣṇīnariṃdamatathā te pāṇḍavā rakṣyāḥ pāhyasmānmahato bhayāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें