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महाभारत 5.71.3
न च तन्नैष्ठिकं कर्म क्षत्रियस्य विशां पतेआहुराश्रमिणः सर्वे यद्भैक्षं क्षत्रियश्चरेत्
na ca tannaiṣṭhikaṃ karma kṣatriyasya viśāṃ pateāhurāśramiṇaḥ sarve yadbhaikṣaṃ kṣatriyaścaret
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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