महाभारत 5.72.7
स मन्युवशमापन्नः स्वभावं दुष्टमास्थितःस्वभावात्पापमन्वेति तृणैस्तुन्न इवोरगः
sa manyuvaśamāpannaḥ svabhāvaṃ duṣṭamāsthitaḥsvabhāvātpāpamanveti tṛṇaistunna ivoragaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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