महाभारत 5.73.7
एकान्ते निष्टनञ्शेषे भारार्त इव दुर्बलःअपि त्वां केचिदुन्मत्तं मन्यन्तेऽतद्विदो जनाः
ekānte niṣṭanañśeṣe bhārārta iva durbalaḥapi tvāṃ kecidunmattaṃ manyante'tadvido janāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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