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महाभारत 5.76.1
अर्जुन उवाच · arjuna uvāca
उक्तं युधिष्ठिरेणैव यावद्वाच्यं जनार्दनतव वाक्यं तु मे श्रुत्वा प्रतिभाति परंतप
uktaṃ yudhiṣṭhireṇaiva yāvadvācyaṃ janārdanatava vākyaṃ tu me śrutvā pratibhāti paraṃtapa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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