महाभारत 5.76.2
नैव प्रशममत्र त्वं मन्यसे सुकरं प्रभोलोभाद्वा धृतराष्ट्रस्य दैन्याद्वा समुपस्थितात्
naiva praśamamatra tvaṃ manyase sukaraṃ prabholobhādvā dhṛtarāṣṭrasya dainyādvā samupasthitāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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