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महाभारत 5.76.6
संपाद्यमानं सम्यक्च स्यात्कर्म सफलं प्रभोस तथा कृष्ण वर्तस्व यथा शर्म भवेत्परैः
saṃpādyamānaṃ samyakca syātkarma saphalaṃ prabhosa tathā kṛṣṇa vartasva yathā śarma bhavetparaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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