महाभारत 5.76.8
कुरूणां पाण्डवानां च प्रतिपत्स्व निरामयम्अस्मद्धितमनुष्ठातुं न मन्ये तव दुष्करम्
kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca pratipatsva nirāmayamasmaddhitamanuṣṭhātuṃ na manye tava duṣkaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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