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महाभारत 5.78.18
श्रोता चार्थस्य विदुरस्त्वं च वक्ता जनार्दनकमिवार्थं विवर्तन्तं स्थापयेतां न वर्त्मनि
śrotā cārthasya vidurastvaṃ ca vaktā janārdanakamivārthaṃ vivartantaṃ sthāpayetāṃ na vartmani
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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