महाभारत 5.80.1
वैशंपायन उवाच · vaiśaṃpāyana uvāca
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम्कृष्णा दाशार्हमासीनमब्रवीच्छोककर्षिता
rājñastu vacanaṃ śrutvā dharmārthasahitaṃ hitamkṛṣṇā dāśārhamāsīnamabravīcchokakarṣitā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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