महाभारत 5.80.36
अयं ते पुण्डरीकाक्ष दुःशासनकरोद्धृतःस्मर्तव्यः सर्वकालेषु परेषां संधिमिच्छता
ayaṃ te puṇḍarīkākṣa duḥśāsanakaroddhṛtaḥsmartavyaḥ sarvakāleṣu pareṣāṃ saṃdhimicchatā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें