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महाभारत 5.80.39
दुःशासनभुजं श्यामं संछिन्नं पांसुगुण्ठितम्यद्यहं तं न पश्यामि का शान्तिर्हृदयस्य मे
duḥśāsanabhujaṃ śyāmaṃ saṃchinnaṃ pāṃsuguṇṭhitamyadyahaṃ taṃ na paśyāmi kā śāntirhṛdayasya me
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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