महाभारत 5.85.3
लेखाश्मनीव भाः सूर्ये महोर्मिरिव सागरेधर्मस्त्वयि महान्राजन्निति व्यवसिताः प्रजाः
lekhāśmanīva bhāḥ sūrye mahormiriva sāgaredharmastvayi mahānrājanniti vyavasitāḥ prajāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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