महाभारत 5.85.7
न तु त्वं धर्ममुद्दिश्य तस्य वा प्रियकारणात्एतदिच्छसि कृष्णाय सत्येनात्मानमालभे
na tu tvaṃ dharmamuddiśya tasya vā priyakāraṇātetadicchasi kṛṣṇāya satyenātmānamālabhe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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