महाभारत 5.88.20
राजर्षीणां पुराणानां धुरं धत्ते दुरुद्वहाम्शीलवृत्तोपसंपन्नो धर्मज्ञः सत्यसंगरः
rājarṣīṇāṃ purāṇānāṃ dhuraṃ dhatte durudvahāmśīlavṛttopasaṃpanno dharmajñaḥ satyasaṃgaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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