महाभारत 5.88.2
सा दृष्ट्वा कृष्णमायान्तं प्रसन्नादित्यवर्चसम्कण्ठे गृहीत्वा प्राक्रोशत्पृथा पार्थाननुस्मरन्
sā dṛṣṭvā kṛṣṇamāyāntaṃ prasannādityavarcasamkaṇṭhe gṛhītvā prākrośatpṛthā pārthānanusmaran
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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