महाभारत 5.88.45
पतिभिः पञ्चभिः शूरैरग्निकल्पैः प्रहारिभिःउपपन्ना महेष्वासैर्द्रौपदी दुःखभागिनी
patibhiḥ pañcabhiḥ śūrairagnikalpaiḥ prahāribhiḥupapannā maheṣvāsairdraupadī duḥkhabhāginī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें