महाभारत 5.88.4
साब्रवीत्कृष्णमासीनं कृतातिथ्यं युधां पतिम्बाष्पगद्गदपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता
sābravītkṛṣṇamāsīnaṃ kṛtātithyaṃ yudhāṃ patimbāṣpagadgadapūrṇena mukhena pariśuṣyatā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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