महाभारत 5.88.73
पराश्रया वासुदेव या जीवामि धिगस्तु माम्वृत्तेः कृपणलब्धाया अप्रतिष्ठैव ज्यायसी
parāśrayā vāsudeva yā jīvāmi dhigastu māmvṛtteḥ kṛpaṇalabdhāyā apratiṣṭhaiva jyāyasī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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