महाभारत 5.89.10
तत्र गोविन्दमासीनं प्रसन्नादित्यवर्चसम्उपासां चक्रिरे सर्वे कुरवो राजभिः सह
tatra govindamāsīnaṃ prasannādityavarcasamupāsāṃ cakrire sarve kuravo rājabhiḥ saha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें