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महाभारत 5.9.21
वज्रमस्य क्षिपाम्यद्य स क्षिप्रं न भविष्यतिशत्रुः प्रवृद्धो नोपेक्ष्यो दुर्बलोऽपि बलीयसा
vajramasya kṣipāmyadya sa kṣipraṃ na bhaviṣyatiśatruḥ pravṛddho nopekṣyo durbalo'pi balīyasā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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