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महाभारत 5.9.32
अद्यापि चाहमुद्विग्नस्तक्षन्नस्माद्बिभेमि वैक्षिप्रं छिन्धि शिरांसि त्वं करिष्येऽनुग्रहं तव
adyāpi cāhamudvignastakṣannasmādbibhemi vaikṣipraṃ chindhi śirāṃsi tvaṃ kariṣye'nugrahaṃ tava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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