महाभारत 5.91.7
मनसा चिन्तयन्पापं कर्मणा नाभिरोचयन्न प्राप्नोति फलं तस्य एवं धर्मविदो विदुः
manasā cintayanpāpaṃ karmaṇā nābhirocayanna prāpnoti phalaṃ tasya evaṃ dharmavido viduḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें