महाभारत 5.94.28ततोऽस्मै प्रासृजद्घोरमैषीकमपराजितःअस्त्रमप्रतिसंधेयं तदद्भुतमिवाभवत्tato'smai prāsṛjadghoramaiṣīkamaparājitaḥastramapratisaṃdheyaṃ tadadbhutamivābhavatइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें