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महाभारत 5.94.33
कृतप्रज्ञो वीतलोभो निरहंकार आत्मवान्दान्तः क्षान्तो मृदुः क्षेमः प्रजाः पालय पार्थिव
kṛtaprajño vītalobho nirahaṃkāra ātmavāndāntaḥ kṣānto mṛduḥ kṣemaḥ prajāḥ pālaya pārthiva
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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